"सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह ने रविवार को भारत के हिंदू राष्ट्र होने को लेकर बड़ी टिप्पणी की है। जस्टिस कोटिश्वर ने कहाकि भारत का संविधान कभी भी इसे धार्मिक देश होने का इजाजत नहीं देता है। उन्होंने कहाकि हिंदू शब्द ऐतिहासिक रूप से बड़े पैमाने पर उन लोगों के लिए इस्तेमाल होता आया है जो सिंधु नदी के पार रहते हैं। जस्टिस सिंह नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी स्टूडेंट बार एसोसिएशन लॉ (NLIU-SBA) कॉन्क्लेव 2026 में ‘21वीं सदी में कानून और न्याय की नई कल्पना: चुनौतियां, जवाबदेही और सुधार’ विषय पर बोल रहे थे।"
संविधान सबसे रचनात्मक कानूनी दस्तावेज
"जस्टिस सिंह ने आगे कहाकि बहुत कम देश हैं जो भारत की तरह सभी धर्मों को मान्यता देते हैं। भारत कभी खुद को हिंदू राष्ट्र नहीं कहता है। बल्कि विदेशी लोग हिंदू शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए करते रहें जो हैं सिंधु के पार रहते हैं। जस्टिस सिंह ने कहाकि जहां तक मेरी समझ है, ऐसे में यह सवाल कि हिंदु क्या हैं, इसका कोई मायने नहीं है। हालांकि कुछ लोग मेरी बातों से असहमत हो सकते हैं। लेकिन हिंदू शब्द का कोई मतलब नहीं है। हिंदू बस वो लोग हैं जो सिंधु नदी के पार रहते हैं। उन्होंने संविधान को वह दस्तावेज बताया जिसने वह दूरदृष्टि और आदर्श तय किए जिन्होंने भारत की आजादी को आकार दिया और जो आज भी उसके भविष्य की राह दिखा रहा है। उन्होंने कहाकि हमारे सामने संविधान है, जो सबसे रचनात्मक कानूनी दस्तावेज है। साथ ही यह यह एक ऐतिहासिक और सामाजिक दस्तावेज भी है।"
पश्चिमी असर पर बात
"अपने भाषण के दौरान, जस्टिस सिंह ने भारत के लीगल सिस्टम पर पश्चिमी असर को फिर से देखने की बात कही। साथ ही मॉडर्न इंस्टीट्यूशन को बनाने में इसकी भूमिका को भी माना। उन्होंने कहाकि मुझे पश्चिमी शिक्षा से कोई दिक्कत नहीं है। मैं खुद भी उसी की देन हूं। लेकिन अब समय आ गया है कि इससे आगे देखा जाए, क्योंकि पश्चिमी कानूनी शिक्षा व्यवस्था शायद भारत के सभी हालात, आज के हालात से निपट नहीं सकता। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत के लीगल सिस्टम को अपनी सामाजिक सच्चाइयों के हिसाब से चलना होगा।"
पारंपरिक तरीकों को खोजने की जरूरत
"जस्टिस सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि ज्यादातर मुकदमे ग्रामीण भारत से आते हैं। यह मामले डिस्ट्रिक्ट कोर्ट लेवल पर निपटाए जाते हैं। उन्होंने अपने अंदर झांकने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि पारंपरिक तरीकों को फिर से खोजने से आज के कानूनी तर्क मजबूत हो सकते हैं और सिस्टम भारतीय असलियत से ज्यादा जुड़ा हो सकता है। साथ ही, उन्होंने कानूनी संस्थाओं और जिन लोगों की वे सेवा करते हैं, उनके बीच बढ़ते अलगाव की ओर भी इशारा किया, खासकर भाषा की रुकावटों और मुश्किल कानूनी शब्दों की वजह से।"
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